Saturday, June 28, 2014

I have experienced the airing of Mahabharat Bhishma and Shree Krishna dialogues in war field. We should always consider Dharma in our life with wishdom, action which includes decision making and able to bear the fruit of that decision,because until and unless you are not able to take decision you can not perform Karma. Your decision may be wrong or right. If you do not take decision in apprehension that your Karma may be fruitful or may not be fruitful to you, to your surrounding peoples,your organisation etc, then it will be considered that you have not perform any Karma. we think that we will be in bondage with our Karma and fearing that we avoid doing Karma and try to remain in Shanti (peace of mind) (Kaun in sab bandhano me pare).
But this feeling is not justified for a precious life of a human being. Lord Krishna says Bandhan se mukta hone ke liye nishkam karma karna chahiye that means one should not expect the fruit of ones Karma . So always take decision with your Dharma and consciousness and remember the Almighty. Krishna ko samjho Ram ko jano. Ram teaches how to perform ones Dharma towards your nearby people, your parents,wife,children,other relatives,friends, people at your working places,assistants etc and Krishna inspire for action to perform your Dharma.
One thing more, what I have understand that Dharma is not always static, it may change according to time,place and situation. Change is a perpetual nature of life (pariwartan jeevan ka shashwat dharma hai) so one should be flexible while taking decision according to need of time,place and situation.
It is my views, not my lecture, I just want to share with you. Excuse if there is any wrong in my sharing.

Tuesday, December 31, 2013



मेरे प्रिय आत्मजनो,

आप सभी को सपरिवार अंतररास्ट्रीय स्तर पर सार्वभौमिक रूप से  मान्यता प्राप्त
Gregorian calendar के अनुसार नव वर्ष की शुभ कामनायें। ईश्वर से प्रार्थना है कि 
यह वर्ष आपके जीवन में नयी सकरात्मक  ऊर्जा का संचार करे।शारीरिक एवं मानसिक
स्तर पर सभी अवरोधों को दूर करते हुए आपको अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर करने में 
यह वर्ष  सहायक हो। 

कभी कभी हमारे समक्ष यह आलोचनात्मक  प्रश्न  रखा जाता है  कि भारतीय संस्कृति में तो नव वर्ष वासंतिक चैत्र  नवरात्र के प्रथम दिन से प्रारम्भ होता है तो फिर हम पहली जनवरी को ही पाष्चात्य अनुकरण में  नव वर्ष इतना धूम धाम से क्यों मानते है। क्योंकि जैसा कि  हमने ऊपर उल्लेख किया है  इसे अंतररास्ट्रीय स्तर पर सार्वभौमिक रूप से  मान्यता प्राप्त  है।वैसे भी कृषि प्रधान देश होने के कारण   भारत वर्ष में अलग अलग राज्यों में अलग अलग नव वर्ष अलग अलग समय में   मानाने का प्रचलन है जिसे  हम स्थान विशेष की   परम्परा के अनुसार मान्यता देते हैं। हमें अपनी संस्कृति को कभी भी नहीं भूलना चाहिए और उसका ह्रदय से सम्मान करना चाहिए।  किन्तु यदि हमें वैश्विक ( आज के  ग्लोबलाईजेशन के युग में   ) स्तर पर राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक पहचान बनानी है तो किसी न किसी  सार्वभौमिक रूप से  मान्यता प्राप्त  माध्यम का सहारा लेना ही पड़ेगा।

एक बात और, यदि हमें  पाष्चात्य अनुकरण की कटु आलोचना ही करना है तो सर्वप्रथम हमें पूर्ण रूप से भारतीय जीवन शैली को अपनाना होगा। ऐसा नहीं कि हम अपने संतान को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाकर अपना स्टेटस सिम्बल बनायें या भविष्य कि जरूरत बनायें , पाष्चात्य परिधान को अपनी सहूलियत बनायें , वे तमाम ऐशो आराम कि वस्तुओं, जिनका अधिकतम  आविष्कार  पष्चिमी देशों में किया गया है, को अपनाकर अपना आधुनिक जीवन शैली बनाये। इस प्रकार की दोहरी मानसिकता से बचना चाहिए।  

बेहतर होगा कि हम मध्यम मार्ग का अनुशरण करते हुए एक ऐसी  जीवन शैली को अपनाये जिससे हमारी स्पर्धात्मक क्षमता का विकास हो और हम अपने भारतीय संस्कृति की जड़ों से अटूट रूप से जुड़े भी रहें। अपनी मूल्यों से समझौता न करें। 

कहीं सुना था कि ये पाप है क्या पुण्य है क्या, रितों पर धर्म कि मुहरे हैं , हर युग में बदलते धर्मों को आदर्श कैसे बनाओगे। 



Friday, November 29, 2013


श्रेष्ठ और बेहतर 

     आज के सामाजिक परिवेश में इन दो शब्दों का चयन और उपयोग बहुत ही महत्वपूर्ण होगया है। मनुष्य की आकांक्षा श्रेष्ठ्ता की ओर अधिक है आज प्रत्येक परिवार में जैसे ही बच्चा स्कूल जाने लगता है,उसके माता -पिता की चाह होती है कि उसका बच्चा सभी अन्य बच्चो से श्रेष्ठ परिणाम दे अर्थात पाठशाला की भाषा में उसका बच्चा फर्स्ट आये । समाज में एवं कार्य क्षेत्र में हममें एक अदम्य इच्छा जोर पकड़ती रहती है कि हमारा  स्थान श्रेष्ठ पर बना रहे। श्रेष्ठता की मानोविज्ञान में आपसी स्पर्धा की भावना पैदा होती  है।स्पर्धा में नकरात्मक  विचार एवं कार्य का सहारा लेना भी सम्भावित हो सकता है। तथा   किसी उद्येश्य की प्राप्ति के लिए व्यक्ति विशेष की मौलिक  क्षमता से कहीं ज्यादा उसे प्रयास करना पड़ता है और फिर भी जब उसे मनोवांछित परिणाम प्राप्त नहीं होता है तो 
असंतोष एवं हताशा  की भावना पैदा होती है जिसका प्रभाव व्यकित विशेष के कार्य क्षमता पर भी पड़ता है। 

       अत: उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में एक और शब्द का प्रयोग हम कर सकते हैं और वह है ' उत्तम ' या बेहतर अर्थात हमारे पास जो उपलब्ध क्षमता है,साधन है  उसका प्रयोग हम बेहतरी से करे या उत्तम प्रकार से करें जिसका परिणाम निश्चित रूप से अच्छा होगा, इसमें स्पर्धा की कटुता नहीं होगी,आपसी ईर्ष्या,द्वेष एवं असफलता का भय नहीं होगा और असंतोष की जगह संतोष होगा जो हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति की और अधिक प्रेरित एवं उत्साहित करेगा। 

    यह सम्भव नहीं और जरुरी नहीं कि सभी बच्चे एक साथ फर्स्ट आये किसी न किसी को सेकेण्ड,थर्ड या फोर्थ आदि  आना ही होगा। क्या जो फर्स्ट नहीं आया वह अयोग्य है, ऐसा नहीं, उसने अपनी योग्यता,अपनी क्षमता  का बेहतर प्रदर्शन किया है। इसी प्रकार जीविका उपार्जन हेतु अपने कार्य स्थल पर प्राय: यह देखने को मिलता है कि अधिकारी या कर्मचारी विशेष के अथक प्रयास करने के उपरांत भी वांछित परिणाम प्राप्त नहीं होता है जिस कारण उस व्यक्ति विशेष के नियंत्रित अधिकारी दूसरों के सामने  उसकी उपेक्षा करते हैं,उसका मनोबल नीचा करते हैं। इससे उसकी प्रोडक्टिविटी और कम हो सकती है।  इन परिस्थितियों में  आवश्यकता है  उसके आत्मविश्वास को  और अधिक बढ़ाकर उसे मोटीवेट करने का, प्रशिक्षित करने का  ताकि भविष्य में वह  और अधिक बेहतर परिणाम दे सके। 
     यह मेरा अपना विचार है, हो सकता है कुछ महानुभाव तार्किक रूप से  इससे सहमत न हो।   

Thursday, October 31, 2013

मेरे सभी आत्मजनो ,

आप  सभी को दीपावली की शुभ कामनाएं .  मनोंरंजन और उतसव में भेद है। मनोरंजन में आप तमाशा देखते हैं  उसमें  सम्मिलित नहीं होते हैं जबकि उतसव में आपकी भागीदारी  होती है ,आपका स्वयं का जीवन भी उतसव के रस  में रसविभोर हो उठता है। किसी दैनिक  लेख में सत्य कहा गया है कि  ज्ञान  के प्रकाश के प्रकट होने का उत्सव ही दिवाली है।अत: इस दीपावली पर्व में प्रेम,समृद्धि ,सेवा और करुणा और ज्ञान  का दीपक जलाकर इस पावन उत्सव में हम सब भाग लें। . किसी न किसी रूप में दूसरों की,जरूरतमंद की  सहायता करनी चाहिए।  इस प्रसंग में ' हिंदी -सोच के माध्यम से प्रकाशित आइये एक प्रेरणादायक कहानी का आनंद लें।  कहानी का शीर्षक है बदलाव 

 बदलाव
एक लड़का हर sunday सुबह सुबह तालाब के किनारे jogging करने जाता था. और हमेशा एक बूढी महिला को देखता था. जो किनारे पर बनी बेंच पर बैठकर तालाब के छोटे छोटे कछुओ को उठाकर उनकी पीठ साफ़ किया करती थी..
एक ऐसे ही sunday को जब वो लड़का वहाँ से गुज़रा तो उसी महिला को देखा.. इस बार वो उनके पास गया और पूछा..
“नमस्ते, मैं हमेशा आपको कछुओ की पीठ साफ़ करते हुए देखता हूँ.. आप ऐसा क्यों करती है?”
महिला ने पहले तो उसे देखा, और फिर शांत मुस्कराहट के साथ कहा- ” मैं हर रविवार को यहाँ आती हूँ.. और शान्ति का सुख लेते हुए.. इन छोटे छोटे दोस्तों के कवच साफ़ करती हूँ.. .. दरअसल, इनकी पीठ पर जो काई, और दूसरी चीज़े चिपकी रह जाती है.. उनसे इनके कवच की गर्मी पैदा करने की क्षमता कम पड़ जाती है. और तैरने में भी इन्हें तकलीफ देती है.. कुछ सालो में इनके कवच कमजोर भी पड़ जाते है.. इसलिए मैं यहाँ बैठकर इन्हें साफ़ करती हूँ..”
लड़का थोडा हैरान था.. वो बोला ” ये है तो बहुत ही अच्छी बात है.. और मैं समझ सकता हूँ की ये एक अच्छा काम है पर.. क्या आपको नहीं लगता की दुनिया भर में न जाने ऐसे कितने कछुए होगे. और शायद उनकी मदद करने के लिए कोई नहीं है.. आपको नहीं लगता की आप अपने वक़्त का बेहतर इस्तेमाल कर सकती हैं..”
महिला ने कहा, ” मुझे इसे करने में ख़ुशी मिलती है.. दुनिया में बदलाव पैदा करने का ये मेरा तरीका है.”
लड़का और भी हैरान हुआ.. बोला “इससे भला दुनिया में कैसा बदलाव आएगा?”
महिला ने अपने हाथ में रखे कछुए की तरफ इशारा करते हुए कहा.. ” भले ही पूरी दुनिया में इससे कोई बदलाव न आये.. पर इस छोटे से कछुए से पूछो, मेरे इस कार्य से इसके जीवन में कितना बड़ा बदलाव आएगा”
सबक: यदि आप सहायता करने के काबिल है. तो करें. हो सकता है आपके द्वारा की हुई छोटी सी मदद पूरी दुनिया में बदलाव की लहर न ला पाए. पर वो एक व्यक्ति, जिसकी आपने हेल्प की है, उसकी दुनिया आप खुशहाल कर सकते है.



   

Wednesday, October 30, 2013

आप का स्वागत है। आज भाई -बहन के पावन पर्व पर आप सभी को हार्दिक बधाई। 

Monday, October 28, 2013


                                                            मनोबल एवं आत्मबल 

प्राय हम मनोबल एवं आत्मबल को एक सामान समझने की कोशिस करते  हैं। एक टीवी कार्यक्रम को देखने के समय मुझे इन दोनों शब्दों को समझ ने में  सहायता मिली।  उसमे दो परिस्थितियों को उदाहरण के रूप में  प्रस्तुत किया गया। जब आंधी -तूफान या भीषण जल प्रवाह होता है तो बहुत सारे  वृक्ष उखड़ कर बह जाते हैं पर उनमे से कुछ अपने भूमि से जुड़े रहते हैं जिनमें फिर से नए कोपल निकलने लगते हैं और आगे चल कर वे विशाल वृक्ष के रूप में पल्लवित - पुष्पित होते हैं यह उस वृक्ष का मनोबल हुआ अर्थात जो मनुष्य विपरीत  परिस्थितियों  में अपने धैर्य -धर्म और साहस  से जुड़े रहने का प्रयास करते हैं वे फिर से शक्ति संचय कर आगे बढ़ने में समर्थ होते हैं, यह उनका मनोबल हुआ। अब एक दूसरा उदाहरण, कुछ वृक्ष के जड़ों को भूमि में ही उपलब्ध  कीट या अन्य नुक्सानदेय  कीड़े मकोड़े नुकसान पहुचाकर उस वृक्ष  को नष्ट करने का प्रयास करते हैं या उस वृक्ष को आगे बढ़ने  से रोकते हैं  लेकिन कुछ  वृक्ष इन कीट या अन्य नुक्सानदेय  कीड़े मकोड़े के चोट से बच कर या उन्हें सहकर   अपना अस्तित्व बनाये रखने में समर्थ होते हैं  यह उनका आत्मबल हुआ।  अर्थात जब मनुष्य को उसके  अपने ही  अंदर स्थित  दुर्बलताएँ जैसे,काम, क्रोध,लोभ,
मोह ,मद, स्वार्थपरायणता,ईर्ष्या आदि उसे कमजोर बनाने की कोशिश करती हैं, उसे सही निर्णय लेने से रोकती है या  अवरोध उत्पन्न करती हैं, या उसे गलत रास्ते  पर चलने या गलत निर्णय लेने केलिए  प्रेरित  करती  है   तो ऐसे स्थिति में वह मनुष्य  अपने चारित्रिक एवं नीतिगत   गुणों (वैल्यूज ) का सहारा लेकर उनका सामना करता है और अपने लक्ष के प्रति अडिग रह कर आगे की और बढ़ता चला जाता  है और सही निर्णय लेने में  सक्षम होता है   तो यह उसका आत्मबल हुआ। 

Monday, October 21, 2013

अभी हाल ही में. पित्रपक्ष  के समय मित्रो द्वारा आयोजित भागवत सप्ताह में एक प्रसंग में तुलसी दास रचित  रामायण में उल्लिखित निम्नलिखित उक्तियों का   उल्लेख किया गया   :

हानि लाभ यश अपयश सब विधि हाथ।

कथावाचक ने इसे दो प्रकार से व्याख्या किया।

प्रथम यह कि  जीवन में जो भी हानि या लाभ ,यश या अपयश प्राप्त हो ता है  वह विधि अर्थात भाग्य द्वारा निर्धारित होता है।  उदाहरण के लिए यदि नौकरी में किसी दूसरे मेहनतकश योग्य व्यकित की तुलना में    किसी को बिना अधिक प्रयास या पुरुषार्थ किये किसी गाड फ़ादर या जुगाड़  के चलते यदि प्रोन्नति मिलता है या अधिक अवसर प्राप्त होता है, या  अन्य किसी प्रकार की सुविधा मिलता है तो इससे द्वेष की भावना नही रखनी चाहिये क्योंकि यह सुख सुविधा उसके भाग में प्राप्त होना लिखा हुआ है।  एक ही समय- नक्षत्र में दो बच्चे जन्म लेते है पर एक का जन्म खाते पीते संपन्न परिवार में होता है तो दूसरे का जन्म पड़ोस के झोपडी-झुग्गी में एक एक दाने के लिए  लालायित परिवार में होता है - यह सब वही विधि यानि की भाग्य की बात है।  

दूसरी व्याख्या के अनुसार हानि लाभ यश अपयश कर्म पर आधारित है। यहाँ विधि का तात्पर्य आपके कार्य या कर्म करने के तरीके से है।  किस विधि से आपने उस कार्य या कर्म को सम्पादित किया है।  आपकी सफलता या असफलता आपके द्वारा अपनाये गए तरीके पर बहुत कुछ निर्भर करता है। उदाहरण के लिए किसी कार्य को सफल बनाने में आपकी योजना या प्लानिग,आवश्यक  घटको या उपादान  की व्यवस्था एवं जानकारी यानि नालेज  , आपकी टीम संचालन सामर्थ्य ,समय प्रबंधन और फिर कार्यन्वयन या एग्जीक्युशन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी प्रकार आपको यश मिलेगा या अपयश यह आपके कार्य करने या वांछित वस्तु को प्राप्त करने के तरीके पर निर्भर करता है। यदि आपने सही या सच्चाई  का  रास्ता अपना कर अपने पुरुषार्थ से सफलता प्राप्त की है  तो आप यश के भागी होते है।  और यदि आपने अपने स्वार्थ की पूर्ति छल से,दूसरों को नुक्सान पहूचाकर, उसकी निन्दा कर ,चापलूसी कर या राजनीती यानि पालिटिक्स खेल कर किया है  तो आज नही तो कल आप अपयश के भागी अवश्य होंगे और नही तो आपका अपना मन जिसे  विवेक या जमीर कहते है, आपको रह रह कर  सतायेगा।