Tuesday, December 31, 2013



मेरे प्रिय आत्मजनो,

आप सभी को सपरिवार अंतररास्ट्रीय स्तर पर सार्वभौमिक रूप से  मान्यता प्राप्त
Gregorian calendar के अनुसार नव वर्ष की शुभ कामनायें। ईश्वर से प्रार्थना है कि 
यह वर्ष आपके जीवन में नयी सकरात्मक  ऊर्जा का संचार करे।शारीरिक एवं मानसिक
स्तर पर सभी अवरोधों को दूर करते हुए आपको अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर करने में 
यह वर्ष  सहायक हो। 

कभी कभी हमारे समक्ष यह आलोचनात्मक  प्रश्न  रखा जाता है  कि भारतीय संस्कृति में तो नव वर्ष वासंतिक चैत्र  नवरात्र के प्रथम दिन से प्रारम्भ होता है तो फिर हम पहली जनवरी को ही पाष्चात्य अनुकरण में  नव वर्ष इतना धूम धाम से क्यों मानते है। क्योंकि जैसा कि  हमने ऊपर उल्लेख किया है  इसे अंतररास्ट्रीय स्तर पर सार्वभौमिक रूप से  मान्यता प्राप्त  है।वैसे भी कृषि प्रधान देश होने के कारण   भारत वर्ष में अलग अलग राज्यों में अलग अलग नव वर्ष अलग अलग समय में   मानाने का प्रचलन है जिसे  हम स्थान विशेष की   परम्परा के अनुसार मान्यता देते हैं। हमें अपनी संस्कृति को कभी भी नहीं भूलना चाहिए और उसका ह्रदय से सम्मान करना चाहिए।  किन्तु यदि हमें वैश्विक ( आज के  ग्लोबलाईजेशन के युग में   ) स्तर पर राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक पहचान बनानी है तो किसी न किसी  सार्वभौमिक रूप से  मान्यता प्राप्त  माध्यम का सहारा लेना ही पड़ेगा।

एक बात और, यदि हमें  पाष्चात्य अनुकरण की कटु आलोचना ही करना है तो सर्वप्रथम हमें पूर्ण रूप से भारतीय जीवन शैली को अपनाना होगा। ऐसा नहीं कि हम अपने संतान को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाकर अपना स्टेटस सिम्बल बनायें या भविष्य कि जरूरत बनायें , पाष्चात्य परिधान को अपनी सहूलियत बनायें , वे तमाम ऐशो आराम कि वस्तुओं, जिनका अधिकतम  आविष्कार  पष्चिमी देशों में किया गया है, को अपनाकर अपना आधुनिक जीवन शैली बनाये। इस प्रकार की दोहरी मानसिकता से बचना चाहिए।  

बेहतर होगा कि हम मध्यम मार्ग का अनुशरण करते हुए एक ऐसी  जीवन शैली को अपनाये जिससे हमारी स्पर्धात्मक क्षमता का विकास हो और हम अपने भारतीय संस्कृति की जड़ों से अटूट रूप से जुड़े भी रहें। अपनी मूल्यों से समझौता न करें। 

कहीं सुना था कि ये पाप है क्या पुण्य है क्या, रितों पर धर्म कि मुहरे हैं , हर युग में बदलते धर्मों को आदर्श कैसे बनाओगे। 



Friday, November 29, 2013


श्रेष्ठ और बेहतर 

     आज के सामाजिक परिवेश में इन दो शब्दों का चयन और उपयोग बहुत ही महत्वपूर्ण होगया है। मनुष्य की आकांक्षा श्रेष्ठ्ता की ओर अधिक है आज प्रत्येक परिवार में जैसे ही बच्चा स्कूल जाने लगता है,उसके माता -पिता की चाह होती है कि उसका बच्चा सभी अन्य बच्चो से श्रेष्ठ परिणाम दे अर्थात पाठशाला की भाषा में उसका बच्चा फर्स्ट आये । समाज में एवं कार्य क्षेत्र में हममें एक अदम्य इच्छा जोर पकड़ती रहती है कि हमारा  स्थान श्रेष्ठ पर बना रहे। श्रेष्ठता की मानोविज्ञान में आपसी स्पर्धा की भावना पैदा होती  है।स्पर्धा में नकरात्मक  विचार एवं कार्य का सहारा लेना भी सम्भावित हो सकता है। तथा   किसी उद्येश्य की प्राप्ति के लिए व्यक्ति विशेष की मौलिक  क्षमता से कहीं ज्यादा उसे प्रयास करना पड़ता है और फिर भी जब उसे मनोवांछित परिणाम प्राप्त नहीं होता है तो 
असंतोष एवं हताशा  की भावना पैदा होती है जिसका प्रभाव व्यकित विशेष के कार्य क्षमता पर भी पड़ता है। 

       अत: उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में एक और शब्द का प्रयोग हम कर सकते हैं और वह है ' उत्तम ' या बेहतर अर्थात हमारे पास जो उपलब्ध क्षमता है,साधन है  उसका प्रयोग हम बेहतरी से करे या उत्तम प्रकार से करें जिसका परिणाम निश्चित रूप से अच्छा होगा, इसमें स्पर्धा की कटुता नहीं होगी,आपसी ईर्ष्या,द्वेष एवं असफलता का भय नहीं होगा और असंतोष की जगह संतोष होगा जो हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति की और अधिक प्रेरित एवं उत्साहित करेगा। 

    यह सम्भव नहीं और जरुरी नहीं कि सभी बच्चे एक साथ फर्स्ट आये किसी न किसी को सेकेण्ड,थर्ड या फोर्थ आदि  आना ही होगा। क्या जो फर्स्ट नहीं आया वह अयोग्य है, ऐसा नहीं, उसने अपनी योग्यता,अपनी क्षमता  का बेहतर प्रदर्शन किया है। इसी प्रकार जीविका उपार्जन हेतु अपने कार्य स्थल पर प्राय: यह देखने को मिलता है कि अधिकारी या कर्मचारी विशेष के अथक प्रयास करने के उपरांत भी वांछित परिणाम प्राप्त नहीं होता है जिस कारण उस व्यक्ति विशेष के नियंत्रित अधिकारी दूसरों के सामने  उसकी उपेक्षा करते हैं,उसका मनोबल नीचा करते हैं। इससे उसकी प्रोडक्टिविटी और कम हो सकती है।  इन परिस्थितियों में  आवश्यकता है  उसके आत्मविश्वास को  और अधिक बढ़ाकर उसे मोटीवेट करने का, प्रशिक्षित करने का  ताकि भविष्य में वह  और अधिक बेहतर परिणाम दे सके। 
     यह मेरा अपना विचार है, हो सकता है कुछ महानुभाव तार्किक रूप से  इससे सहमत न हो।   

Thursday, October 31, 2013

मेरे सभी आत्मजनो ,

आप  सभी को दीपावली की शुभ कामनाएं .  मनोंरंजन और उतसव में भेद है। मनोरंजन में आप तमाशा देखते हैं  उसमें  सम्मिलित नहीं होते हैं जबकि उतसव में आपकी भागीदारी  होती है ,आपका स्वयं का जीवन भी उतसव के रस  में रसविभोर हो उठता है। किसी दैनिक  लेख में सत्य कहा गया है कि  ज्ञान  के प्रकाश के प्रकट होने का उत्सव ही दिवाली है।अत: इस दीपावली पर्व में प्रेम,समृद्धि ,सेवा और करुणा और ज्ञान  का दीपक जलाकर इस पावन उत्सव में हम सब भाग लें। . किसी न किसी रूप में दूसरों की,जरूरतमंद की  सहायता करनी चाहिए।  इस प्रसंग में ' हिंदी -सोच के माध्यम से प्रकाशित आइये एक प्रेरणादायक कहानी का आनंद लें।  कहानी का शीर्षक है बदलाव 

 बदलाव
एक लड़का हर sunday सुबह सुबह तालाब के किनारे jogging करने जाता था. और हमेशा एक बूढी महिला को देखता था. जो किनारे पर बनी बेंच पर बैठकर तालाब के छोटे छोटे कछुओ को उठाकर उनकी पीठ साफ़ किया करती थी..
एक ऐसे ही sunday को जब वो लड़का वहाँ से गुज़रा तो उसी महिला को देखा.. इस बार वो उनके पास गया और पूछा..
“नमस्ते, मैं हमेशा आपको कछुओ की पीठ साफ़ करते हुए देखता हूँ.. आप ऐसा क्यों करती है?”
महिला ने पहले तो उसे देखा, और फिर शांत मुस्कराहट के साथ कहा- ” मैं हर रविवार को यहाँ आती हूँ.. और शान्ति का सुख लेते हुए.. इन छोटे छोटे दोस्तों के कवच साफ़ करती हूँ.. .. दरअसल, इनकी पीठ पर जो काई, और दूसरी चीज़े चिपकी रह जाती है.. उनसे इनके कवच की गर्मी पैदा करने की क्षमता कम पड़ जाती है. और तैरने में भी इन्हें तकलीफ देती है.. कुछ सालो में इनके कवच कमजोर भी पड़ जाते है.. इसलिए मैं यहाँ बैठकर इन्हें साफ़ करती हूँ..”
लड़का थोडा हैरान था.. वो बोला ” ये है तो बहुत ही अच्छी बात है.. और मैं समझ सकता हूँ की ये एक अच्छा काम है पर.. क्या आपको नहीं लगता की दुनिया भर में न जाने ऐसे कितने कछुए होगे. और शायद उनकी मदद करने के लिए कोई नहीं है.. आपको नहीं लगता की आप अपने वक़्त का बेहतर इस्तेमाल कर सकती हैं..”
महिला ने कहा, ” मुझे इसे करने में ख़ुशी मिलती है.. दुनिया में बदलाव पैदा करने का ये मेरा तरीका है.”
लड़का और भी हैरान हुआ.. बोला “इससे भला दुनिया में कैसा बदलाव आएगा?”
महिला ने अपने हाथ में रखे कछुए की तरफ इशारा करते हुए कहा.. ” भले ही पूरी दुनिया में इससे कोई बदलाव न आये.. पर इस छोटे से कछुए से पूछो, मेरे इस कार्य से इसके जीवन में कितना बड़ा बदलाव आएगा”
सबक: यदि आप सहायता करने के काबिल है. तो करें. हो सकता है आपके द्वारा की हुई छोटी सी मदद पूरी दुनिया में बदलाव की लहर न ला पाए. पर वो एक व्यक्ति, जिसकी आपने हेल्प की है, उसकी दुनिया आप खुशहाल कर सकते है.



   

Wednesday, October 30, 2013

आप का स्वागत है। आज भाई -बहन के पावन पर्व पर आप सभी को हार्दिक बधाई। 

Monday, October 28, 2013


                                                            मनोबल एवं आत्मबल 

प्राय हम मनोबल एवं आत्मबल को एक सामान समझने की कोशिस करते  हैं। एक टीवी कार्यक्रम को देखने के समय मुझे इन दोनों शब्दों को समझ ने में  सहायता मिली।  उसमे दो परिस्थितियों को उदाहरण के रूप में  प्रस्तुत किया गया। जब आंधी -तूफान या भीषण जल प्रवाह होता है तो बहुत सारे  वृक्ष उखड़ कर बह जाते हैं पर उनमे से कुछ अपने भूमि से जुड़े रहते हैं जिनमें फिर से नए कोपल निकलने लगते हैं और आगे चल कर वे विशाल वृक्ष के रूप में पल्लवित - पुष्पित होते हैं यह उस वृक्ष का मनोबल हुआ अर्थात जो मनुष्य विपरीत  परिस्थितियों  में अपने धैर्य -धर्म और साहस  से जुड़े रहने का प्रयास करते हैं वे फिर से शक्ति संचय कर आगे बढ़ने में समर्थ होते हैं, यह उनका मनोबल हुआ। अब एक दूसरा उदाहरण, कुछ वृक्ष के जड़ों को भूमि में ही उपलब्ध  कीट या अन्य नुक्सानदेय  कीड़े मकोड़े नुकसान पहुचाकर उस वृक्ष  को नष्ट करने का प्रयास करते हैं या उस वृक्ष को आगे बढ़ने  से रोकते हैं  लेकिन कुछ  वृक्ष इन कीट या अन्य नुक्सानदेय  कीड़े मकोड़े के चोट से बच कर या उन्हें सहकर   अपना अस्तित्व बनाये रखने में समर्थ होते हैं  यह उनका आत्मबल हुआ।  अर्थात जब मनुष्य को उसके  अपने ही  अंदर स्थित  दुर्बलताएँ जैसे,काम, क्रोध,लोभ,
मोह ,मद, स्वार्थपरायणता,ईर्ष्या आदि उसे कमजोर बनाने की कोशिश करती हैं, उसे सही निर्णय लेने से रोकती है या  अवरोध उत्पन्न करती हैं, या उसे गलत रास्ते  पर चलने या गलत निर्णय लेने केलिए  प्रेरित  करती  है   तो ऐसे स्थिति में वह मनुष्य  अपने चारित्रिक एवं नीतिगत   गुणों (वैल्यूज ) का सहारा लेकर उनका सामना करता है और अपने लक्ष के प्रति अडिग रह कर आगे की और बढ़ता चला जाता  है और सही निर्णय लेने में  सक्षम होता है   तो यह उसका आत्मबल हुआ। 

Monday, October 21, 2013

अभी हाल ही में. पित्रपक्ष  के समय मित्रो द्वारा आयोजित भागवत सप्ताह में एक प्रसंग में तुलसी दास रचित  रामायण में उल्लिखित निम्नलिखित उक्तियों का   उल्लेख किया गया   :

हानि लाभ यश अपयश सब विधि हाथ।

कथावाचक ने इसे दो प्रकार से व्याख्या किया।

प्रथम यह कि  जीवन में जो भी हानि या लाभ ,यश या अपयश प्राप्त हो ता है  वह विधि अर्थात भाग्य द्वारा निर्धारित होता है।  उदाहरण के लिए यदि नौकरी में किसी दूसरे मेहनतकश योग्य व्यकित की तुलना में    किसी को बिना अधिक प्रयास या पुरुषार्थ किये किसी गाड फ़ादर या जुगाड़  के चलते यदि प्रोन्नति मिलता है या अधिक अवसर प्राप्त होता है, या  अन्य किसी प्रकार की सुविधा मिलता है तो इससे द्वेष की भावना नही रखनी चाहिये क्योंकि यह सुख सुविधा उसके भाग में प्राप्त होना लिखा हुआ है।  एक ही समय- नक्षत्र में दो बच्चे जन्म लेते है पर एक का जन्म खाते पीते संपन्न परिवार में होता है तो दूसरे का जन्म पड़ोस के झोपडी-झुग्गी में एक एक दाने के लिए  लालायित परिवार में होता है - यह सब वही विधि यानि की भाग्य की बात है।  

दूसरी व्याख्या के अनुसार हानि लाभ यश अपयश कर्म पर आधारित है। यहाँ विधि का तात्पर्य आपके कार्य या कर्म करने के तरीके से है।  किस विधि से आपने उस कार्य या कर्म को सम्पादित किया है।  आपकी सफलता या असफलता आपके द्वारा अपनाये गए तरीके पर बहुत कुछ निर्भर करता है। उदाहरण के लिए किसी कार्य को सफल बनाने में आपकी योजना या प्लानिग,आवश्यक  घटको या उपादान  की व्यवस्था एवं जानकारी यानि नालेज  , आपकी टीम संचालन सामर्थ्य ,समय प्रबंधन और फिर कार्यन्वयन या एग्जीक्युशन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी प्रकार आपको यश मिलेगा या अपयश यह आपके कार्य करने या वांछित वस्तु को प्राप्त करने के तरीके पर निर्भर करता है। यदि आपने सही या सच्चाई  का  रास्ता अपना कर अपने पुरुषार्थ से सफलता प्राप्त की है  तो आप यश के भागी होते है।  और यदि आपने अपने स्वार्थ की पूर्ति छल से,दूसरों को नुक्सान पहूचाकर, उसकी निन्दा कर ,चापलूसी कर या राजनीती यानि पालिटिक्स खेल कर किया है  तो आज नही तो कल आप अपयश के भागी अवश्य होंगे और नही तो आपका अपना मन जिसे  विवेक या जमीर कहते है, आपको रह रह कर  सतायेगा। 

Friday, September 13, 2013

आज दिनांक 13 . 09 . 2013 को   टीवी  चेनेल में  निर्भया बलात्कार केस में फांसी की सजा पाये  एक आरोपी अक्षय ठाकुर की माँ एवं पत्नी को रोते हुए तथा यह कहते  हुए सुना कि अब उन्हें कौन देखेगा। जिस तरह का जघन्य अपराध इस आरोपी ने किया था , अगर वह सजा से बच के आजाता और अपने मा एवं पत्नी के लिए भोजन आदि की व्यवस्था करता तो क्या वह मा, वह पत्नी उस जघन्य सामाजिक अपराधी के द्वारा लाये गए अन्न को अपने गले से  उतार पाती। एक नारी हो ने के नाते उस  मासुम बच्ची  निर्भया पर हुए अमानुशिक अत्याचार,उसके लुटते हुए लाज को  एवं असह्य  पीड़ा को क्या वह मा,वह पत्नी याद नही करती, भूल जाती ।  आज भी एतिहासिक फ़िल्म मदर इंडिया का वह मार्मिक दृश्य याद आता है  जिसमें एक गांव की असहाय बूढी   मा अपने लाडले बेटे को इस बात  पर गोली मार देती है कि  वह मा उसके  बेटे  के हाथों एक  लड़की की लाज, जो सारे   गांव की लाज थी, को कलंकित होना नही देखना चाहती थी  भले ही उस लड्की के साहूकार पिता ने उस मा और उसके बेटे पर,उसके परिवार पर कितना ही  अत्याचार किया था.

Monday, September 2, 2013

इन सुखद सरल और स्वभाविक स्मृतियों के साथ तुम्हारा प्रत्येक दिन नई आशा एवं उत्साह भरा हो !

Sunday, September 1, 2013

हम क्यों अपने को दूसरों  के सामने महिमामंडित करते है कल जो लोग भगवान मान कर पूजते थे आज हमें संशय की दृष्टि से देख रहे है। कयों हम भगवान बनने की कोशिश करते है क्यों न  हम एक इंसान बनने का प्रयास करें जिसमें काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद हो  पर ये सब हमारे वश में हों,मर्यादा  में  हों  तथा  इन  प्राकृतिक गुणों का   उपयोग हम रचनात्मक कार्यों के लिए करें  

Thursday, August 29, 2013

दिनांक 28 अगस्त 2013 को  लखनऊ से  प्रकाशित एक प्रसिद्ध हिन्दी समाचार पत्र में   कृष्ण के लिलाओ के  विषय में पढ़ कर मुझे यही लगा कि आज का विचारशील  भारतिय  कितनी आसानी के साथ उस श्री कृष्ण के व्यक्तित्व एवं  कार्यकलापों  [  जेसे  गोपिकाओं एवं 108 रानियों   के साथ उनका संबंध,झूठ बोलवाकर या किसी के आड़ में   शत्रु पर प्रहार करवाना अदि] का विश्लेषण कर उन  क्रियाकलापों  को आज हमारे समाज में हो रहे  बदलते सामाजिक मर्यादाओं के साथ तुलना करते हुए इन बदलाओं को सही ठहरा कर विकसित  बौद्धिकता का परिचय दे रहे है जबकि आदि अनंत काल से हमारे ऋषि,संत महात्मा तप करते हुए अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतित कर दिए तब भी वे  कृष्ण और उनके लिलाओके रहसय को नहीं समझ पाये। और जिस भारतिय सामाजिक व्यवस्था में बदलाओं लाने की बात कर रहे हें , हमारे ऋषियों- मनीषियों ने भारतीय जलवायु,पर्यावरण एवं परिवेश का  अध्यन करते हुए उनके अनुरूप उस  व्यवस्था को स्थापित करने में  कितने युग लगा दिए। तब जाकर एक विकसित  भारतिय सभ्यता का जन्म हुआ और जब भारतिय सभ्यता अपने चरमोत्कर्ष पर था  तब तथाकथित पश्चमि सभ्यता का जन्म होना कहा जाता है। 

Tuesday, February 19, 2013

I had an opportunity to participate in a Seminar on HR Intervention for Organisational Excellence on 16th Feb 2013. The Seminar  which was organised by National Institute of Personnel Management,UP Chapter,Lucknow. was attended by some of top business HR heads like Director HR IFFCO,Director UP  Power Corporation Ltd,HR heads of Tata Motors,NTPC,ONGC,Hindustan Aeoronautics Ltd,and eminent speakers from Institutions like IIM etc. I would like to share some of the key points with my HR fraternity.

What I have come to know from the talk of Director (HR) IFFCO that now a days HR functions are not limited to its routine work  like some welfare,motivational and administrative  activities for the employees as it has been  in practice since year back , rather it has now enlarged its ambit and now  it is being aligned with the business  business of the organisation and doing so it has now reached to the Board of the company. 

Now competency of HR managers assessed through Relationship,Communication skill,language skill,  competent to Global and Cultural Effectiveness,critical evaluation and its contribution to the business of the organisation, When we talk about global culture that means now a days organisations require such employees who may come in contact with different countries of the world for the business purpose. HR should know the different type of custom and culture of different countries e.g. how to shake hand, how to welcome,how to say goodbye,how to present oneself so that it may assist new recruitees who may be sent to abroad for the business of the organisation.

Professional integrity is necessary and that is on top requirement for a particular field.For fulfiling the high ambition study is must.Change is goo and it always take place for the progress, Today people communicate electronically  through face book,twiter etc. by which  Your evaluation is also being done .

India is one of such countries where large number of young force persists. We have to develop the talent. HR should look beyond the Organisation and look into the society. While serving your organisation, what contribution of yours  will be  for the society.Today there is CSR concept i.e. Corporate Social Responsibility. Need felt to develop the mediocre .HR have to have strategy not for the best but for the most appropriate talent. Today's leadership requirement is for being innovative and visionary,influencive,value based who establish the culture, able to anticipate unseen and what is obvious that not to be ignored. Due to being innovative and being visionary today some of companies like Apple,Google,Pantaloon,software industries etc.have made themselves different.

Your  strategy(over all your plan,milestone to achieve) works through Organisation's Strategies,Environment,Characterstic,Capabilities which help to define a vision,communicate the vision,establish core competence,develop leadership and thereby develop and motivate your human resource.Become a role model with your value based behaviour.In this context HR Professor from IIM talk about Indian Ethical concept of ' Dhriti i.e. patience, 'Kshma' i.e. forgiveness, 'Dum' i.e. control over desire, 'Astaya' i.e. not to steal and 'Shauch' i.e. physical and spiritual cleanliness.

Another HR professor speaks why people become attracted to a particular Employer Brand. The culture and system and character of the organisation establish a particular Brand for the organisation, which may or may not attract employee to work within. It also cover Interest value,social value,economic value,developmental value and application value of the organisation. Similarly there is vicious cycle also which effect the organisation e.g. weak team spirit - low enthusiasm-low productivity-low profit etc.etc. HR managers have a vital role to establish a particular Employer Brand.

Another retired dignitary from the HR fraternity talks to stimulate HR people to global standard to be a global manager.According to him one should respectful to the individual irrespective of his role, should be concerned for people, to be punctual, posses leadership quality which does not demand any diploma,degree. One should have final accountability for the outcome of the assignment. There should be ethical conduct i.e. value based,truthfulness,reliability, not to please boss for some favour rather he should have professional attitude for the interest of the organisation. 

In her valedictory address one eminent guest who is an industrialist and  MP also, says, Today HR runs the business of the organisation by recruiting appropriate person for appropriate job. Here HR 's role is match maker. HR nurtures new recruitees as per the requirement of the organisation. It is HR to attract the people to come in the organisation.

One  important thing they have stressed  tobe  remembered - To make the world better make yourself better. Make a better person that will make the world better

So some of the points emerges from the Seminar have been placed before you. It is not only for HR rather it may apply every body who  has a leadership quality so what  which stream he belongs to.