Thursday, August 29, 2013

दिनांक 28 अगस्त 2013 को  लखनऊ से  प्रकाशित एक प्रसिद्ध हिन्दी समाचार पत्र में   कृष्ण के लिलाओ के  विषय में पढ़ कर मुझे यही लगा कि आज का विचारशील  भारतिय  कितनी आसानी के साथ उस श्री कृष्ण के व्यक्तित्व एवं  कार्यकलापों  [  जेसे  गोपिकाओं एवं 108 रानियों   के साथ उनका संबंध,झूठ बोलवाकर या किसी के आड़ में   शत्रु पर प्रहार करवाना अदि] का विश्लेषण कर उन  क्रियाकलापों  को आज हमारे समाज में हो रहे  बदलते सामाजिक मर्यादाओं के साथ तुलना करते हुए इन बदलाओं को सही ठहरा कर विकसित  बौद्धिकता का परिचय दे रहे है जबकि आदि अनंत काल से हमारे ऋषि,संत महात्मा तप करते हुए अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतित कर दिए तब भी वे  कृष्ण और उनके लिलाओके रहसय को नहीं समझ पाये। और जिस भारतिय सामाजिक व्यवस्था में बदलाओं लाने की बात कर रहे हें , हमारे ऋषियों- मनीषियों ने भारतीय जलवायु,पर्यावरण एवं परिवेश का  अध्यन करते हुए उनके अनुरूप उस  व्यवस्था को स्थापित करने में  कितने युग लगा दिए। तब जाकर एक विकसित  भारतिय सभ्यता का जन्म हुआ और जब भारतिय सभ्यता अपने चरमोत्कर्ष पर था  तब तथाकथित पश्चमि सभ्यता का जन्म होना कहा जाता है।