Monday, October 21, 2013

अभी हाल ही में. पित्रपक्ष  के समय मित्रो द्वारा आयोजित भागवत सप्ताह में एक प्रसंग में तुलसी दास रचित  रामायण में उल्लिखित निम्नलिखित उक्तियों का   उल्लेख किया गया   :

हानि लाभ यश अपयश सब विधि हाथ।

कथावाचक ने इसे दो प्रकार से व्याख्या किया।

प्रथम यह कि  जीवन में जो भी हानि या लाभ ,यश या अपयश प्राप्त हो ता है  वह विधि अर्थात भाग्य द्वारा निर्धारित होता है।  उदाहरण के लिए यदि नौकरी में किसी दूसरे मेहनतकश योग्य व्यकित की तुलना में    किसी को बिना अधिक प्रयास या पुरुषार्थ किये किसी गाड फ़ादर या जुगाड़  के चलते यदि प्रोन्नति मिलता है या अधिक अवसर प्राप्त होता है, या  अन्य किसी प्रकार की सुविधा मिलता है तो इससे द्वेष की भावना नही रखनी चाहिये क्योंकि यह सुख सुविधा उसके भाग में प्राप्त होना लिखा हुआ है।  एक ही समय- नक्षत्र में दो बच्चे जन्म लेते है पर एक का जन्म खाते पीते संपन्न परिवार में होता है तो दूसरे का जन्म पड़ोस के झोपडी-झुग्गी में एक एक दाने के लिए  लालायित परिवार में होता है - यह सब वही विधि यानि की भाग्य की बात है।  

दूसरी व्याख्या के अनुसार हानि लाभ यश अपयश कर्म पर आधारित है। यहाँ विधि का तात्पर्य आपके कार्य या कर्म करने के तरीके से है।  किस विधि से आपने उस कार्य या कर्म को सम्पादित किया है।  आपकी सफलता या असफलता आपके द्वारा अपनाये गए तरीके पर बहुत कुछ निर्भर करता है। उदाहरण के लिए किसी कार्य को सफल बनाने में आपकी योजना या प्लानिग,आवश्यक  घटको या उपादान  की व्यवस्था एवं जानकारी यानि नालेज  , आपकी टीम संचालन सामर्थ्य ,समय प्रबंधन और फिर कार्यन्वयन या एग्जीक्युशन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी प्रकार आपको यश मिलेगा या अपयश यह आपके कार्य करने या वांछित वस्तु को प्राप्त करने के तरीके पर निर्भर करता है। यदि आपने सही या सच्चाई  का  रास्ता अपना कर अपने पुरुषार्थ से सफलता प्राप्त की है  तो आप यश के भागी होते है।  और यदि आपने अपने स्वार्थ की पूर्ति छल से,दूसरों को नुक्सान पहूचाकर, उसकी निन्दा कर ,चापलूसी कर या राजनीती यानि पालिटिक्स खेल कर किया है  तो आज नही तो कल आप अपयश के भागी अवश्य होंगे और नही तो आपका अपना मन जिसे  विवेक या जमीर कहते है, आपको रह रह कर  सतायेगा। 

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