Monday, October 28, 2013


                                                            मनोबल एवं आत्मबल 

प्राय हम मनोबल एवं आत्मबल को एक सामान समझने की कोशिस करते  हैं। एक टीवी कार्यक्रम को देखने के समय मुझे इन दोनों शब्दों को समझ ने में  सहायता मिली।  उसमे दो परिस्थितियों को उदाहरण के रूप में  प्रस्तुत किया गया। जब आंधी -तूफान या भीषण जल प्रवाह होता है तो बहुत सारे  वृक्ष उखड़ कर बह जाते हैं पर उनमे से कुछ अपने भूमि से जुड़े रहते हैं जिनमें फिर से नए कोपल निकलने लगते हैं और आगे चल कर वे विशाल वृक्ष के रूप में पल्लवित - पुष्पित होते हैं यह उस वृक्ष का मनोबल हुआ अर्थात जो मनुष्य विपरीत  परिस्थितियों  में अपने धैर्य -धर्म और साहस  से जुड़े रहने का प्रयास करते हैं वे फिर से शक्ति संचय कर आगे बढ़ने में समर्थ होते हैं, यह उनका मनोबल हुआ। अब एक दूसरा उदाहरण, कुछ वृक्ष के जड़ों को भूमि में ही उपलब्ध  कीट या अन्य नुक्सानदेय  कीड़े मकोड़े नुकसान पहुचाकर उस वृक्ष  को नष्ट करने का प्रयास करते हैं या उस वृक्ष को आगे बढ़ने  से रोकते हैं  लेकिन कुछ  वृक्ष इन कीट या अन्य नुक्सानदेय  कीड़े मकोड़े के चोट से बच कर या उन्हें सहकर   अपना अस्तित्व बनाये रखने में समर्थ होते हैं  यह उनका आत्मबल हुआ।  अर्थात जब मनुष्य को उसके  अपने ही  अंदर स्थित  दुर्बलताएँ जैसे,काम, क्रोध,लोभ,
मोह ,मद, स्वार्थपरायणता,ईर्ष्या आदि उसे कमजोर बनाने की कोशिश करती हैं, उसे सही निर्णय लेने से रोकती है या  अवरोध उत्पन्न करती हैं, या उसे गलत रास्ते  पर चलने या गलत निर्णय लेने केलिए  प्रेरित  करती  है   तो ऐसे स्थिति में वह मनुष्य  अपने चारित्रिक एवं नीतिगत   गुणों (वैल्यूज ) का सहारा लेकर उनका सामना करता है और अपने लक्ष के प्रति अडिग रह कर आगे की और बढ़ता चला जाता  है और सही निर्णय लेने में  सक्षम होता है   तो यह उसका आत्मबल हुआ। 

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