श्रेष्ठ और बेहतर
आज के सामाजिक परिवेश में इन दो शब्दों का चयन और उपयोग बहुत ही महत्वपूर्ण होगया है। मनुष्य की आकांक्षा श्रेष्ठ्ता की ओर अधिक है आज प्रत्येक परिवार में जैसे ही बच्चा स्कूल जाने लगता है,उसके माता -पिता की चाह होती है कि उसका बच्चा सभी अन्य बच्चो से श्रेष्ठ परिणाम दे अर्थात पाठशाला की भाषा में उसका बच्चा फर्स्ट आये । समाज में एवं कार्य क्षेत्र में हममें एक अदम्य इच्छा जोर पकड़ती रहती है कि हमारा स्थान श्रेष्ठ पर बना रहे। श्रेष्ठता की मानोविज्ञान में आपसी स्पर्धा की भावना पैदा होती है।स्पर्धा में नकरात्मक विचार एवं कार्य का सहारा लेना भी सम्भावित हो सकता है। तथा किसी उद्येश्य की प्राप्ति के लिए व्यक्ति विशेष की मौलिक क्षमता से कहीं ज्यादा उसे प्रयास करना पड़ता है और फिर भी जब उसे मनोवांछित परिणाम प्राप्त नहीं होता है तो
असंतोष एवं हताशा की भावना पैदा होती है जिसका प्रभाव व्यकित विशेष के कार्य क्षमता पर भी पड़ता है।
अत: उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में एक और शब्द का प्रयोग हम कर सकते हैं और वह है ' उत्तम ' या बेहतर अर्थात हमारे पास जो उपलब्ध क्षमता है,साधन है उसका प्रयोग हम बेहतरी से करे या उत्तम प्रकार से करें जिसका परिणाम निश्चित रूप से अच्छा होगा, इसमें स्पर्धा की कटुता नहीं होगी,आपसी ईर्ष्या,द्वेष एवं असफलता का भय नहीं होगा और असंतोष की जगह संतोष होगा जो हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति की और अधिक प्रेरित एवं उत्साहित करेगा।
यह सम्भव नहीं और जरुरी नहीं कि सभी बच्चे एक साथ फर्स्ट आये किसी न किसी को सेकेण्ड,थर्ड या फोर्थ आदि आना ही होगा। क्या जो फर्स्ट नहीं आया वह अयोग्य है, ऐसा नहीं, उसने अपनी योग्यता,अपनी क्षमता का बेहतर प्रदर्शन किया है। इसी प्रकार जीविका उपार्जन हेतु अपने कार्य स्थल पर प्राय: यह देखने को मिलता है कि अधिकारी या कर्मचारी विशेष के अथक प्रयास करने के उपरांत भी वांछित परिणाम प्राप्त नहीं होता है जिस कारण उस व्यक्ति विशेष के नियंत्रित अधिकारी दूसरों के सामने उसकी उपेक्षा करते हैं,उसका मनोबल नीचा करते हैं। इससे उसकी प्रोडक्टिविटी और कम हो सकती है। इन परिस्थितियों में आवश्यकता है उसके आत्मविश्वास को और अधिक बढ़ाकर उसे मोटीवेट करने का, प्रशिक्षित करने का ताकि भविष्य में वह और अधिक बेहतर परिणाम दे सके।
यह मेरा अपना विचार है, हो सकता है कुछ महानुभाव तार्किक रूप से इससे सहमत न हो।